Wednesday, March 24, 2010

इस देश में जायज़ और नाजायज़ क्या है?

कोर्ट जो कह दे सब माने को तैयार हो जाते है । नहीं तो कौन साला ध्यान देता है है उसपे। लिव इन रिलेशन शिप को कोर्ट ने कहा की क्या बुराई है , वाकई क्या बुराई दो लोग प्यार मोहब्बत से साथ रह रहे हैं तो दुसरे को पेचिश क्यों होवे? पर होती है ! सभी को होती है ! कोर्ट को देख के लगता है की कानून नामक कुछ चीज़ है इंडिया में , समलैंगिक का कानून बन गया , लिव इन रिलेशन शिप पे कोर्ट को कोई ऐतराज़ नहीं है, (औरो को तो है, पर अब कोई बोल के दिखावे ) तो.....

हे कोर्ट देव !
जरा उन बच्चो की और भी ध्यान दीजिये प्यार के नाम पे , समान गोत्र के नाम पे फाँसी पे लटका दिए जाते हैं और समाज, देश टुकुर टुकुर देखता रहता है, अगर वे बालिग नहीं हैं तो क्या उनकी भावनाओ का कोई मायने नहीं है? सोचिये जरा!

Thursday, March 18, 2010

दलित नहीं, दौलत की बेटी !

यूपी "गरीब भारत राज्य" की एक बहुत ही "गरीब इकाई" है । इसे अन्य राज्य बीमारू राज्य में गिनती करते हैं । यहाँ के लोग रोज़गार की तलाश में दुसरे राज्यों में ठोकरे खाते फिर रहें हैं। कभी कभी तो लात जुते भी खा लेते हैं। पर यहाँ की सीएमाइन जी करोडो रुपये का अपना मंदिर बनवा रही हैं. हाल में ही उनको नोटों की माला पहनाई गयी कीमत यही कोई २० करोड़ के आस पास थी । अरे बहन जी कब तक आप अपने भइयों (महारास्ट्र में उत्तर भारतीयों को भईया ही बोला जाता है ) का दोहन शोषण करोगी, बाहर में तो वे होते ही हैं। वैसे दलितों के लिए ही कौन सा तीर मारा है आपने अंबेडकर के नाम पे पार्क बना दे से विकास तो होगा नहीं । कुछ नहीं तो पडोसी बिहार से ही सीखो. कैसे उसने अपने आप को साबित किया आपको मौका मिला है। कुछ करो भाई, कुछ करो !
अगर गरीबी और बेरोजगारी को नहीं उखाड़ पाई आप तो जनता को क्या मुहं दिखाओगी ? वैसे मुह दिखाने वाली कहावत नेताओ पे लागु नहीं होती है ऐसा ना हो की जनता अगले इलेक्शन में आपको उखाड़ फेंके। पर पब्लिक भी तो है की लात जुते खाने को तैयार है पर विकास करने को नहीं। बचपन में पडा की थी की अंधेर नगरी चौपट राजा और पड़ाई कभी बेकार जाती है का ।